5 साल 8 महीने 29 दिन जेल… फिर भी नहीं मिला सबूत! इस अन्याय का ज़िम्मेदार कौन?

5 साल 8 महीने 29 दिन जेल… फिर भी नहीं मिला सबूत! इस अन्याय का ज़िम्मेदार कौन?

Jan 8, 2026 - 20:21
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5 साल 8 महीने 29 दिन जेल… फिर भी नहीं मिला सबूत! इस अन्याय का ज़िम्मेदार कौन?

देश की न्याय व्यवस्था पर आज एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

दिल्ली हिंसा मामले में एक बड़ा अपडेट सामने आया है।

जहाँ एक तरफ 5 आरोपियों को ज़मानत मिल गई है,

वहीं दूसरी ओर उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी भी राहत नहीं मिली है।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि—

जब अदालत में पुख्ता सबूत पेश नहीं हो पाए,

तो फिर 5 साल 8 महीने 29 दिन तक ये लोग जेल में क्यों रहे?

अगर सबूत नहीं थे…

तो ये सालों की क़ैद किसके आदेश पर हुई?

और अब इस ज़िंदगी के बर्बाद हुए सालों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

दिल्ली हिंसा से जुड़े इस मामले में जिन पांच लोगों को आज ज़मानत मिली है,

उनके वकीलों का कहना है कि—

👉 इतने लंबे समय तक जांच चली

👉 चार्जशीट्स दाखिल होती रहीं

👉 लेकिन ठोस और निर्णायक सबूत अदालत के सामने नहीं रखे जा सके

फिर भी इन लोगों ने अपने जीवन के सबसे कीमती साल

जेल की चारदीवारी के भीतर गुज़ार दिए।

⚖️ सवाल सिस्टम पर

यह मामला सिर्फ कुछ लोगों की ज़िंदगी का नहीं है…

यह सवाल है हमारी न्यायिक प्रक्रिया,

हमारी जांच एजेंसियों,

और हमारी जवाबदेही व्यवस्था पर।

अगर कोई व्यक्ति बेगुनाह साबित होता है,

तो क्या उसके खोए हुए साल वापस आ सकते हैं?

क्या कोई उसकी टूटी हुई ज़िंदगी,

टूटे हुए रिश्ते,

और बर्बाद हुए करियर की भरपाई कर सकता है?

🧠 उमर खालिद और शरजील इमाम

उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी भी ज़मानत नहीं मिली है।

उन पर लगे आरोपों को लेकर बहस जारी है,

लेकिन सवाल वही है—

अगर इतने सालों में

पुख्ता सबूत नहीं मिल पाए,

तो फिर ये लंबी क़ैद क्यों?

क्या विचारधारा अब अपराध बन चुकी है?

क्या असहमति अब सज़ा का कारण है?

💔 इंसानी पहलू

सोचिए…

जब एक इंसान जेल जाता है,

तो सिर्फ वही नहीं…

उसके साथ उसका पूरा परिवार सज़ा काटता है।

माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं,

बच्चे अपने पिता को तस्वीरों में पहचानते हैं,

और ज़िंदगी एक ठहराव में फँस जाती है।

और अगर अंत में कहा जाए—

“सबूत नहीं मिले”

तो ये शब्द उन बर्बाद सालों को लौटा सकते हैं क्या?

📢 बड़ा सवाल

आज सवाल ये नहीं है कि

किसे ज़मानत मिली और किसे नहीं…

सवाल ये है—

👉 बिना ठोस सबूत के सालों तक जेल में रखना क्या न्याय है?

👉 अगर ये गलत है, तो इसका ज़िम्मेदार कौन?

👉 और क्या कभी इस सिस्टम से माफ़ी मांगी जाएगी?

आज ज़रूरत है कि हम सिर्फ फैसले न पढ़ें,

बल्कि उनके पीछे छुपी इंसानी कहानियों को भी समझें।

क्योंकि जब इंसाफ़ में देरी होती है…

तो वो अक्सर इंसाफ़ नहीं, ज़ुल्म बन जाती है।

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